नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में एक और युगांतकारी और बड़ा बदलाव किया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) की सिफारिशों को अमलीजामा पहनाते हुए सीबीएसई ने कक्षा 9वीं और 10वीं के लिए नया 'थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला' (Three-Language Formula) अनिवार्य करने का आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। बोर्ड द्वारा जारी आदेश के मुताबिक, यह नया नियम आगामी 1 जुलाई से पूरे देश के सभी सीबीएसई संबद्ध स्कूलों में पूरी तरह लागू हो जाएगा।
​हालांकि, वर्तमान सत्र के छात्रों को एक बड़ी अंतरिम राहत देते हुए बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि इस साल 10वीं कक्षा के छात्रों को थर्ड लैंग्वेज का बोर्ड पेपर नहीं देना होगा। यह नियम नए शैक्षणिक सत्र के 9वीं के छात्रों से चरणबद्ध तरीके से शुरू होकर आगे बढ़ेगा। आइए जानते हैं सीबीएसई के इस ऐतिहासिक नोटिफिकेशन की पूरी इनसाइड स्टोरी और इसका छात्रों पर क्या असर पड़ेगा।
​क्या है सीबीएसई का नया नोटिफिकेशन? 3 भाषाओं का गणित समझिए
​सीबीएसई द्वारा जारी किए गए नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, अब कक्षा 9वीं और 10वीं के शैक्षणिक ढांचे (Academic Structure) में भाषाओं के महत्व को काफी बढ़ा दिया गया है। अभी तक लागू व्यवस्था के तहत, 9वीं और 10वीं के छात्रों को मुख्य रूप से दो भाषाएं (Language 1 और Language 2) पढ़नी होती थीं, जिनमें आमतौर पर अंग्रेजी और हिंदी शामिल होती थी।
​लेकिन नए नोटिफिकेशन के बाद अब छात्रों को कुल तीन भाषाएं पढ़नी होंगी। इन तीन भाषाओं के चयन को लेकर बोर्ड ने कुछ कड़े और स्पष्ट नियम तय किए हैं:
​दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य: छात्र जिन तीन भाषाओं का चयन करेंगे, उनमें से कम से कम दो भाषाएं भारतीय मूल की (Native Indian Languages) होनी अनिवार्य हैं। उदाहरण के लिए, एक छात्र हिंदी और संस्कृत के साथ अंग्रेजी चुन सकता है, या तमिल और हिंदी के साथ अंग्रेजी ले सकता है।
​विदेशी भाषाओं का विकल्प: छात्र तीसरी भाषा के रूप में किसी विदेशी भाषा (जैसे फ्रेंच, जर्मन, जापानी आदि) का चयन कर सकते हैं, बशर्ते उनकी पहली दो भाषाएं भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल या अन्य भारतीय भाषाएं हों।
​1 जुलाई से लागू होगा नियम, लेकिन इस साल 10वीं को बड़ी राहत
​सीबीएसई ने साफ किया है कि इस बदलाव को बहुत ही सुव्यवस्थित और चरणबद्ध (Phased Manner) तरीके से लागू किया जा रहा है ताकि छात्रों और स्कूलों पर अचानक से कोई मानसिक या प्रशासनिक बोझ न पड़े।
​अधिसूचना के अनुसार, यह नियम आधिकारिक तौर पर 1 जुलाई से प्रभावी हो जाएगा। लेकिन जो छात्र वर्तमान में 10वीं कक्षा में हैं और अगले साल बोर्ड परीक्षा देने वाले हैं, उनके लिए इस साल थर्ड लैंग्वेज का बोर्ड पेपर आयोजित नहीं किया जाएगा। उन्हें पुराने पैटर्न (दो भाषाओं और कोर विषयों) के आधार पर ही अपनी बोर्ड परीक्षा देनी होगी।
​यह नया थ्री-लैंग्वेज नियम इस साल 9वीं कक्षा में प्रवेश लेने वाले छात्रों पर पूरी तरह लागू होगा। जब ये छात्र अगले साल 10वीं में पहुंचेंगे, तब उनके लिए तीनों भाषाओं को पास करना और उनके अंकों का मूल्यांकन बोर्ड के नए नियमों के तहत किया जाएगा।
​पासिंग क्राइटेरिया में बदलाव: अब सभी भाषाओं में पास होना जरूरी
​सीबीएसई ने कॉपियों के मूल्यांकन और पासिंग क्राइटेरिया (Passing Criteria) को लेकर भी एक बड़ा अपडेट दिया है। नई व्यवस्था के तहत, 9वीं और 10वीं के छात्रों को न केवल तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, बल्कि पास होने के लिए तीनों भाषाओं के पेपर में अलग-अलग न्यूनतम पासिंग मार्क्स लाने होंगे।
​अभी तक यदि कोई छात्र एडिशनल या थर्ड लैंग्वेज लेता था, तो उसके अंक मुख्य विषयों के कम अंकों को रिप्लेस करने में मदद करते थे या वे केवल ग्रेडिंग तक सीमित रहते थे। लेकिन नए नियम के लागू होने के बाद, तीनों भाषाओं को मुख्य विषयों की सूची में शामिल किया जा रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि छात्रों को अब गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान की तरह ही तीनों भाषाओं को समान गंभीरता से पढ़ना होगा।
​क्यों लिया गया थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला लागू करने का फैसला?
​इस बड़े नीतिगत फैसले के पीछे राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (NCF) का मुख्य विजन काम कर रहा है। केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्रालय का मानना है कि भारत एक बहुभाषी (Multilingual) देश है, और छात्रों को अपनी मातृभाषा के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं का ज्ञान होना चाहिए।
​सांस्कृतिक जुड़ाव: इस नियम का मुख्य उद्देश्य स्कूली स्तर पर भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना है। उत्तर भारत के छात्र दक्षिण या पूर्वी भारत की कोई भाषा सीख सकते हैं, जिससे देश की सांस्कृतिक एकता मजबूत होगी।
​संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development): कई वैज्ञानिक शोधों से यह साबित हो चुका है कि जो बच्चे बचपन या किशोरावस्था में एक से अधिक भाषाएं सीखते हैं, उनका मानसिक विकास और तार्किक क्षमता (Logical Reasoning) अन्य बच्चों की तुलना में बेहतर होती है।
​करियर के नए अवसर: बहुभाषी होना आज के ग्लोबल युग में एक बड़ी ताकत है। तीन भाषाओं के ज्ञान से छात्रों को भविष्य में अनुवाद (Translation), विदेशी कूटनीति, पर्यटन और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में करियर बनाने में बड़ी मदद मिलेगी।
​स्कूलों और शिक्षकों के सामने क्या होंगी चुनौतियां?
​सीबीएसई का यह फैसला सुनने में जितना प्रगतिशील है, जमीनी स्तर पर स्कूलों के लिए इसे लागू करना उतना ही चुनौतीपूर्ण होने वाला है।
​शिक्षकों की कमी: देश के कई सुदूर इलाकों या छोटे शहरों के स्कूलों में वर्तमान में सिर्फ हिंदी और अंग्रेजी के शिक्षक उपलब्ध हैं। अब जब तीसरी भाषा (जैसे संस्कृत, उर्दू, बंगाली, कन्नड़ आदि) को अनिवार्य किया जा रहा है, तो स्कूलों को कम समय में योग्य भाषा शिक्षकों (Language Teachers) की भर्ती करनी होगी।
​टाइम-टेबल मैनेजमेंट: स्कूल के रोजाना के टाइम-टेबल में एक और अतिरिक्त पीरियड को जोड़ना और छात्रों पर बिना पढ़ाई का बोझ बढ़ाए इसे संभालना प्रिंसिपल्स के लिए एक टेढ़ी खीर साबित होगा।
​स्टडी मटेरियल की उपलब्धता: सीबीएसई को यह सुनिश्चित करना होगा कि देश के सभी कोनों में चुनी गई तीसरी भाषा की नई एनसीईआरटी (NCERT) किताबें और स्टडी मटेरियल समय पर उपलब्ध हों।
​निष्कर्ष: स्कूली शिक्षा के नए युग की शुरुआत
​सीबीएसई द्वारा 9वीं-10वीं में तीन भाषाओं को अनिवार्य करने का फैसला भारत की शिक्षा प्रणाली को और अधिक समावेशी और समृद्ध बनाने की दिशा में एक साहसिक कदम है। 1 जुलाई से शुरू होने जा रही इस व्यवस्था ने साफ कर दिया है कि आने वाले समय में सिर्फ साइंस और मैथ्स ही नहीं, बल्कि भाषाएं भी छात्रों के रिपोर्ट कार्ड और उनके भविष्य को तय करने में मुख्य भूमिका निभाएंगी। इस साल 10वीं के छात्रों को पेपर न देने की छूट देकर बोर्ड ने एक व्यावहारिक समझदारी दिखाई है, जिससे इस बदलाव को अपनाने में स्कूलों और छात्रों को पर्याप्त समय मिल सकेगा।